Archive for December 2007
प्रकाश अश्मलेखन
इससे पहले कि मैं प्रकाश अश्मलेखन (Photolithography) के बारे में कुछ बताऊँ, पॉलीमर के बारे में थोड़ी जानकारी आवश्यक है। पॉलीमर एक अत्यधिक बड़े आकार का अणु होता है जिसमें कुछ सौ से लेकर कई लाख तक छोटे अणु एक श्रृंखला में जुड़े होते हैं। दैनिक उपयोग में आने वाली अनेक वस्तुयें जैसे कि प्लास्टिक, पॉलीथीन इत्यादि पॉलीमर ही होते हैं। भौतिक व रासायनिक गुणों के आधार पर इन्हें दो वर्गों में बांटा जा सकता है। पहला रैखिक श्रृंखला पॉलीमर (linear chain polymer) जिन्हें सामान्यतया आसानी से विक्षेपित किया जा सकता है और ताप बढ़ाकर पिघलाया जा सकता है। सामान्यतया ये पॉलीमर उपयुक्त विलायक में घुल जाते हैं। दूसरे प्रकार के पॉलीमर में रैखिक श्रृंखलायें भी आपस में रासायनिक बन्धों से जुड़ी होतीं हैं, अतः इन्हें पिघलाना तथा विक्षेपित करना काफ़ी कठिन होता है। साथ ही ये अधिकतर द्रवों में अविलेय होते है।
अब मुख्य बात अर्थात प्रकाश अश्मलेखन के सिद्धांत पर आते हैं। इसके लिये एक ऐसे पॉलीमर का उपयोग करते हैं जो कि पराबैंगनी प्रकाश (ultra violet light) के प्रति संवेदनशील होता है। यह संवेदनशीलता दो तरह की होती है। पहली जिसमें कि पराबैंगनी प्रकाश से पॉलीमर की श्रृंखलायें टूट जाती हैं अतः जहाँ पर प्रकाश पड़ता है उस भाग की विलेयता काफ़ी बढ़ जाती है। इस प्रकार के पॉलीमर को धनात्मक प्रकाश रोधक या पॉज़िटिव फ़ोटो रेजिस्ट कहते है। ऋणात्मक प्रकाश रोधक या नेगेटिव फ़ोटो रेजिस्ट में कुछ सक्रिय समूह होते हैं जो पराबैंगनी प्रकाश से उत्तेजित होकर आपस में रासायनिक बन्ध (chemical bond) बना लेते हैं। अतः प्रकाश पड़ने वाले स्थान की विलेयता कम (नगण्य) हो जाती है। प्रकाश अश्मलेखन के लिये पहले इनमें से किसी एक प्रकार के प्रकाश रोधक की एक पतली झिल्ली (thin film) बनाते हैं फ़िर उस पर जो आकार बनाना हो उस आकार का एक प्रकाश आच्छद (photo mask) या स्टेंसिल बनाते है तथा उसे झिल्ली पर रखकर उसपर समानान्तर पराबैंगनी प्रकाश डालते हैं, जो प्रकाश रोधक से क्रिया करके उसमें रासायनिक बदलाव लाता है।
तत्पश्चात् प्रकाश रोधक झिल्ली को एक उपयुक्त संरचना विकसित करने वाले विलायक (developer) में डालकर धोते हैं जिसे डेवेलप करना बोलते हैं। पराबैंगनी प्रकाश से हुयी क्रिया के अनुसार झिल्ली के विभिन्न भागों की विलेयता भिन्न होती है और झिल्ली पर वांछित संरचना मिल जाती है। धनात्मक प्रकाश रोधक की झिल्ली पर प्रयुक्त आच्छद जैसी ही संरचना मिलती है इसीलिये इसे धनात्मक कहा जाता है। इसके विपरीत ऋणात्मक प्रकाश रोधक पर प्रयुक्त आच्छद के विपरीत संरचना मिलती है अतः इसे ऋणात्मक कहा जाता है।
आजकल लगभग सभी इलेक्ट्रानिक परिपथ इसी विधि का प्रयोग करके बनाये जाते हैं। एकीकृत परिपथ (integrated circuit) के निर्माण में प्रकाश अश्मलेखन का लगभग पचास बार प्रयोग होता है। आधुनिक प्रकाश अश्मलेखन से १०० नैनोमीटर तक की छोटी संरचना सम्भव है। १०० नैनोमीटर से छोटी संरचना के लिये अन्य विधियों जैसे इलेक्ट्रान पुन्ज अश्मलेखन या संकेन्द्रित आयन पुन्ज का प्रयोग करना पड़ता है।
नैनोविज्ञान पढ़ने वाले सभी पाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें…
सूक्ष्म संरचना के तरीके
इस लेख में हम जानेंगे कि सूक्ष्म (माइक्रोमीटर) तथा अतिसूक्ष्म (नैनोमीटर) स्तर पर प्रायः किन विधियों का प्रयोग करके वस्तुओं तथा यंत्रों की संरचना की जाती है।
सूक्ष्म तथा अतिसूक्ष्म सरंचना के तरीकों को मुख्यतः दो प्रवर्गों में विभाजित किया जा सकता है |
१) शीर्ष पाद विधि (Top down approach):
जब प्रारम्भ में पदार्थ का बड़ा टुकड़ा ले कर उसे क्रमशः छोटा करते जाते हैं तो उसे शीर्ष पाद विधि या टॉप डाउन एप्रोच कहते हैं| यह संरचना के परम्परागत तरीकों का ही विकसित रूप है| इसके अंतर्गत आने वाली प्रमुख विधियाँ निम्न लिखित हैं -
क. माइक्रो-मशीनिंग (micro-machining)
ख. प्रकाश अश्मलेखन (photo-lithography)
ग. इलेक्ट्रॉन पुंज अश्मलेखन (electron beam lithography)
घ. संकेंद्रित आयन पुंज (focused ion beam/ FIB)
ङ. लेसर अपक्षरण (laser ablation)
२) आधार ऊर्ध्व विधि (bottom up approach):
इस विधि में एक-एक अणु को संयोजित करके अति सूक्ष्म वस्तुओं का निर्माण किया जाता है| यह नैनो युग में विकसित नयी तकनीक है| यद्यपि अभी यह पूर्ण रूप से विकसित नहीं है और अभी भी इस पर दुनिया भर में शोध चल रही है परन्तु कम से कम सैद्धांतिक रूप से यह काफ़ी आसान, सस्ती तथा न्यूनतम अवसंरचना (infrastructure) वाली विधि है| इसके अंतर्गत आने वाली मुख्य विधि है आणविक स्वतः संयोजन या मॉलीक्यूलर सेल्फ एसेम्बली (molecular self-assembly)|
अगले लेखों में मैं इनमें से कुछ प्रमुख विधियों पर एक एक करके प्रकाश डालूँगा|

