नैनोविज्ञान

नैनोविज्ञान तथा नैनोटेकनोलॉजी के बारे में कुछ रोचक जानकारियाँ…

प्रकाश अश्मलेखन

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इससे पहले कि मैं प्रकाश अश्मलेखन (Photolithography) के बारे में कुछ बताऊँ, पॉलीमर के बारे में थोड़ी जानकारी आवश्यक है। पॉलीमर एक अत्यधिक बड़े आकार का अणु होता है जिसमें कुछ सौ से लेकर कई लाख तक छोटे अणु एक श्रृंखला में जुड़े होते हैं। दैनिक उपयोग में आने वाली अनेक वस्तुयें जैसे कि प्लास्टिक, पॉलीथीन इत्यादि पॉलीमर ही होते हैं। भौतिक व रासायनिक गुणों के आधार पर इन्हें दो वर्गों में बांटा जा सकता है। पहला रैखिक श्रृंखला पॉलीमर (linear chain polymer) जिन्हें सामान्यतया आसानी से विक्षेपित किया जा सकता है और ताप बढ़ाकर पिघलाया जा सकता है। सामान्यतया ये पॉलीमर उपयुक्त विलायक में घुल जाते हैं। दूसरे प्रकार के पॉलीमर में रैखिक श्रृंखलायें भी आपस में रासायनिक बन्धों से जुड़ी होतीं हैं, अतः इन्हें पिघलाना तथा विक्षेपित करना काफ़ी कठिन होता है। साथ ही ये अधिकतर द्रवों में अविलेय होते है।

अब मुख्य बात अर्थात प्रकाश अश्मलेखन के सिद्धांत पर आते हैं। इसके लिये एक ऐसे पॉलीमर का उपयोग करते हैं जो कि पराबैंगनी प्रकाश (ultra violet light) के प्रति संवेदनशील होता है। यह संवेदनशीलता दो तरह की होती है। पहली जिसमें कि पराबैंगनी प्रकाश से पॉलीमर की श्रृंखलायें टूट जाती हैं अतः जहाँ पर प्रकाश पड़ता है उस भाग की विलेयता काफ़ी बढ़ जाती है। इस प्रकार के पॉलीमर को धनात्मक प्रकाश रोधक या पॉज़िटिव फ़ोटो रेजिस्ट कहते है। ऋणात्मक प्रकाश रोधक या नेगेटिव फ़ोटो रेजिस्ट में कुछ सक्रिय समूह होते हैं जो पराबैंगनी प्रकाश से उत्तेजित होकर आपस में रासायनिक बन्ध (chemical bond) बना लेते हैं। अतः प्रकाश पड़ने वाले स्थान की विलेयता कम (नगण्य) हो जाती है। प्रकाश अश्मलेखन के लिये पहले इनमें से किसी एक प्रकार के प्रकाश रोधक की एक पतली झिल्ली (thin film) बनाते हैं फ़िर उस पर जो आकार बनाना हो उस आकार का एक प्रकाश आच्छद (photo mask) या स्टेंसिल बनाते है तथा उसे झिल्ली पर रखकर उसपर समानान्तर पराबैंगनी प्रकाश डालते हैं, जो प्रकाश रोधक से क्रिया करके उसमें रासायनिक बदलाव लाता है।

प्रथम चरण

तत्पश्चात् प्रकाश रोधक झिल्ली को एक उपयुक्त संरचना विकसित करने वाले विलायक (developer) में डालकर धोते हैं जिसे डेवेलप करना बोलते हैं। पराबैंगनी प्रकाश से हुयी क्रिया के अनुसार झिल्ली के विभिन्न भागों की विलेयता भिन्न होती है और झिल्ली पर वांछित संरचना मिल जाती है। धनात्मक प्रकाश रोधक की झिल्ली पर प्रयुक्त आच्छद जैसी ही संरचना मिलती है इसीलिये इसे धनात्मक कहा जाता है। इसके विपरीत ऋणात्मक प्रकाश रोधक पर प्रयुक्त आच्छद के विपरीत संरचना मिलती है अतः इसे ऋणात्मक कहा जाता है।

द्वितीय चरण

आजकल लगभग सभी इलेक्ट्रानिक परिपथ इसी विधि का प्रयोग करके बनाये जाते हैं। एकीकृत परिपथ (integrated circuit) के निर्माण में प्रकाश अश्मलेखन का लगभग पचास बार प्रयोग होता है। आधुनिक प्रकाश अश्मलेखन से १०० नैनोमीटर तक की छोटी संरचना सम्भव है। १०० नैनोमीटर से छोटी संरचना के लिये अन्य विधियों जैसे इलेक्ट्रान पुन्ज अश्मलेखन या संकेन्द्रित आयन पुन्ज का प्रयोग करना पड़ता है।

नैनोविज्ञान पढ़ने वाले सभी पाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें…

Written by अंकुर वर्मा

December 31, 2007 at 2:02 pm

2 Responses

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  1. आप चाहें तो यह सब सूचना विकिपीडीया पर भी डाल दें।

    उन्मुक्त

    January 1, 2008 at 9:55 am

  2. सृजन-सम्मान द्वारा आयोजित सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक ब्लॉग पुरस्कारों की घोषणा की रेटिंग लिस्‍ट में आपका ब्लाग देख कर खुशी हुई। बधाई स्वीकारें।

    Zakir Ali Rajneesh

    January 12, 2008 at 4:14 pm


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