नैनोविज्ञान

नैनोविज्ञान तथा नैनोटेकनोलॉजी के बारे में कुछ रोचक जानकारियाँ…

Archive for the ‘सूक्ष्म संरचना’ Category

इलेक्ट्रॉन पुंज और संकेंद्रित आयन पुंज अश्मलेखन

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सूक्ष्म सरंचना के अगले तरीके हैं संकेंद्रित आयन पुंज (Focused Ion Beam / FIB) और इलेक्ट्रॉन पुंज अश्मलेखन (Electron Beam / e-beam Lithography)।

इलेक्ट्रॉन पुंज अश्मलेखन लगभग प्रकाश अश्मलेखन के ही सिद्धांत पर कार्य करता है। इसमें एक ऐसे पदार्थ (पॉलीमर) की झिल्ली बनाते हैं जिसमें कि इलेक्ट्रॉन पुंज के प्रभाव से रासायनिक बदलाव आते हैं ठीक वैसे ही जैसे प्रकाश रोधक में पराबैंगनी प्रकाश डालने पर आते हैं। इस पदार्थ को इलेक्ट्रॉन पुंज रोधक या ई-बीम रेज़िस्ट कहते हैं। इस विधि में किसी प्रकार के आच्छद का प्रयोग न करके इलेक्ट्रॉन पुंज को ही संकेन्द्रित करके उसका उपयोग कलम की भाँति लिखने में किया जाता है। इस कारण इस विधि से काफ़ी छोटी और जटिल संरचनायें बनाई जा सकती हैं परन्तु यह विधि बहुत धीमी होने की वजह से काफ़ी महँगी है। तुलनात्मक रूप से अगर देखा जाय तो प्रकाश अश्मलेखन मुद्रण जैसा है और इलेक्ट्रॉन पुंज अश्मलेखन कलम से लिखने जैसा।

वहीं दूसरी ओर संकेंद्रित आयन पुंज अश्मलेखन में इलेक्ट्रॉन पुंज के स्थान पर गैलियम आयन पुंज का प्रयोग करते हैं। गैलियम आयन इलेक्ट्रॉन की अपेक्षा काफ़ी भारी होते है। इस कारण संकेंद्रित आयन पुंज का संवेग काफ़ी अधिक होता है और इसका प्रयोग पदार्थ के चयनात्मक अपक्षरण (selective ablation) में किया जाता है। इसके लिये किसी विशिष्ट रोधक पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती, सीधे धातु या मृत्तिका (ceramic) के टुकड़े पर संरचना बनायी जा सकती है। आयन पुंज के प्रयोग से पदार्थ का निक्षेपण (deposition) भी किया जा सकता है। क्रमवार लिखने के कारण यह विधि भी धीमी और महँगी है।

Written by अंकुर वर्मा

March 9, 2008 at 4:38 pm

प्रकाश अश्मलेखन

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इससे पहले कि मैं प्रकाश अश्मलेखन (Photolithography) के बारे में कुछ बताऊँ, पॉलीमर के बारे में थोड़ी जानकारी आवश्यक है। पॉलीमर एक अत्यधिक बड़े आकार का अणु होता है जिसमें कुछ सौ से लेकर कई लाख तक छोटे अणु एक श्रृंखला में जुड़े होते हैं। दैनिक उपयोग में आने वाली अनेक वस्तुयें जैसे कि प्लास्टिक, पॉलीथीन इत्यादि पॉलीमर ही होते हैं। भौतिक व रासायनिक गुणों के आधार पर इन्हें दो वर्गों में बांटा जा सकता है। पहला रैखिक श्रृंखला पॉलीमर (linear chain polymer) जिन्हें सामान्यतया आसानी से विक्षेपित किया जा सकता है और ताप बढ़ाकर पिघलाया जा सकता है। सामान्यतया ये पॉलीमर उपयुक्त विलायक में घुल जाते हैं। दूसरे प्रकार के पॉलीमर में रैखिक श्रृंखलायें भी आपस में रासायनिक बन्धों से जुड़ी होतीं हैं, अतः इन्हें पिघलाना तथा विक्षेपित करना काफ़ी कठिन होता है। साथ ही ये अधिकतर द्रवों में अविलेय होते है।

अब मुख्य बात अर्थात प्रकाश अश्मलेखन के सिद्धांत पर आते हैं। इसके लिये एक ऐसे पॉलीमर का उपयोग करते हैं जो कि पराबैंगनी प्रकाश (ultra violet light) के प्रति संवेदनशील होता है। यह संवेदनशीलता दो तरह की होती है। पहली जिसमें कि पराबैंगनी प्रकाश से पॉलीमर की श्रृंखलायें टूट जाती हैं अतः जहाँ पर प्रकाश पड़ता है उस भाग की विलेयता काफ़ी बढ़ जाती है। इस प्रकार के पॉलीमर को धनात्मक प्रकाश रोधक या पॉज़िटिव फ़ोटो रेजिस्ट कहते है। ऋणात्मक प्रकाश रोधक या नेगेटिव फ़ोटो रेजिस्ट में कुछ सक्रिय समूह होते हैं जो पराबैंगनी प्रकाश से उत्तेजित होकर आपस में रासायनिक बन्ध (chemical bond) बना लेते हैं। अतः प्रकाश पड़ने वाले स्थान की विलेयता कम (नगण्य) हो जाती है। प्रकाश अश्मलेखन के लिये पहले इनमें से किसी एक प्रकार के प्रकाश रोधक की एक पतली झिल्ली (thin film) बनाते हैं फ़िर उस पर जो आकार बनाना हो उस आकार का एक प्रकाश आच्छद (photo mask) या स्टेंसिल बनाते है तथा उसे झिल्ली पर रखकर उसपर समानान्तर पराबैंगनी प्रकाश डालते हैं, जो प्रकाश रोधक से क्रिया करके उसमें रासायनिक बदलाव लाता है।

प्रथम चरण

तत्पश्चात् प्रकाश रोधक झिल्ली को एक उपयुक्त संरचना विकसित करने वाले विलायक (developer) में डालकर धोते हैं जिसे डेवेलप करना बोलते हैं। पराबैंगनी प्रकाश से हुयी क्रिया के अनुसार झिल्ली के विभिन्न भागों की विलेयता भिन्न होती है और झिल्ली पर वांछित संरचना मिल जाती है। धनात्मक प्रकाश रोधक की झिल्ली पर प्रयुक्त आच्छद जैसी ही संरचना मिलती है इसीलिये इसे धनात्मक कहा जाता है। इसके विपरीत ऋणात्मक प्रकाश रोधक पर प्रयुक्त आच्छद के विपरीत संरचना मिलती है अतः इसे ऋणात्मक कहा जाता है।

द्वितीय चरण

आजकल लगभग सभी इलेक्ट्रानिक परिपथ इसी विधि का प्रयोग करके बनाये जाते हैं। एकीकृत परिपथ (integrated circuit) के निर्माण में प्रकाश अश्मलेखन का लगभग पचास बार प्रयोग होता है। आधुनिक प्रकाश अश्मलेखन से १०० नैनोमीटर तक की छोटी संरचना सम्भव है। १०० नैनोमीटर से छोटी संरचना के लिये अन्य विधियों जैसे इलेक्ट्रान पुन्ज अश्मलेखन या संकेन्द्रित आयन पुन्ज का प्रयोग करना पड़ता है।

नैनोविज्ञान पढ़ने वाले सभी पाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें…

Written by अंकुर वर्मा

December 31, 2007 at 2:02 pm