नैनोविज्ञान

नैनोविज्ञान तथा नैनोटेकनोलॉजी के बारे में कुछ रोचक जानकारियाँ…

स्कैनिंग टनलिंग सूक्ष्मदर्शी

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स्कैनिंग टनलिंग सूक्ष्मदर्शी (Scanning Tunneling Microscope) एक प्रकार का क्रमवीक्षण अन्वेषक सूक्ष्मदर्शी (Scanning Probe Microscope) है जो कुछ कुछ आणविक बल सूक्ष्मदर्शी की भाँति ही कार्य करता है। इसमें बाहुधारक के स्थान पर केवल एक शंक्वाकार अतिसूक्ष्म नोक ही होती है जो कि वस्तु की सतह के अतिनिकट जाकर वस्तु से उत्पन्न होने वाले टनलिंग विद्युत धारा प्रवाह (Tunneling Current) को महसूस करके वस्तु की सतह के चित्रण में सहायता करती है। अब थोड़ा टनलिंग विद्युत धारा प्रवाह के बारे में जान लिया जाय। आप जानते होंगे कि दो वस्तुओं के बीच विद्युत धारा प्रवाह तभी संभव होता है जब उन्हें किसी विद्युत चालक तार से जोड़ा जाता है। परन्तु अतिसूक्ष्म वस्तुओं के अध्ययन करते समय जब दो वस्तुओं को काफ़ी निकट लाया जाता है तो उनके बीच भी एक सूक्ष्म विद्युत धारा प्रवाह होने लगता है जिसे टनलिंग विद्युत धारा प्रवाह कहते हैं इसके बारे में और अधिक जानने के लिये शायद आपको क्वांटम यांत्रिकी विषय का एक अध्ययन करना पड़े। खैर जिस वस्तु का सतह चित्रण करना होता है उसके तथा शंक्वाकार अतिसूक्ष्म नोक के बीच एक विभवांतर लगाया जाता है जिसके लिये उस वस्तु का विद्युत चालक होना आवश्यक है। इस कारण से उत्पन्न टनलिंग करंट को एक अमीटर से नापते हैं। यह टनलिंग करंट नोक व वस्तु सतह की दूरी पर निर्भर करता है, कम दूरी अर्थात अधिक करंट। इस प्रकार से सूक्ष्मदर्शी की नोक को वस्तु की सतह के हर भाग पर ले जाकर और उसके टनलिंग करंट को नाप कर सतह का चित्रण कर लेते हैं। दूरी के अलावा ये टनलिंग करंट पदार्थ और उसकी प्रावस्था (phase) पर भी निर्भर करता है। इसलिये यदि कोई वस्तु एक से अधिक पदार्थ अथवा उसकी प्रावस्थाओं से बनी होती है तो उसे भी इस सूक्ष्मदर्शी से देखा जा सकता है। इस सूक्ष्मदर्शी के परिचालन संबन्धी जटिलताओं के चलते और चालक आणविक बल सूक्ष्मदर्शी (Conducting Atomic Force Microscope) के आविष्कार के बाद इसका प्रयोग अपेक्षाकृत कम हो गया है। परन्तु वास्तव में यही सूक्ष्मदर्शी आणविक बल सूक्ष्मदर्शी का प्रेरणा स्रोत है।


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

Written by अंकुर वर्मा

मई 17, 2008 at 10:06 अपराह्न

इलेक्ट्रॉन पुंज और संकेंद्रित आयन पुंज अश्मलेखन

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सूक्ष्म सरंचना के अगले तरीके हैं संकेंद्रित आयन पुंज (Focused Ion Beam / FIB) और इलेक्ट्रॉन पुंज अश्मलेखन (Electron Beam / e-beam Lithography)।

इलेक्ट्रॉन पुंज अश्मलेखन लगभग प्रकाश अश्मलेखन के ही सिद्धांत पर कार्य करता है। इसमें एक ऐसे पदार्थ (पॉलीमर) की झिल्ली बनाते हैं जिसमें कि इलेक्ट्रॉन पुंज के प्रभाव से रासायनिक बदलाव आते हैं ठीक वैसे ही जैसे प्रकाश रोधक में पराबैंगनी प्रकाश डालने पर आते हैं। इस पदार्थ को इलेक्ट्रॉन पुंज रोधक या ई-बीम रेज़िस्ट कहते हैं। इस विधि में किसी प्रकार के आच्छद का प्रयोग न करके इलेक्ट्रॉन पुंज को ही संकेन्द्रित करके उसका उपयोग कलम की भाँति लिखने में किया जाता है। इस कारण इस विधि से काफ़ी छोटी और जटिल संरचनायें बनाई जा सकती हैं परन्तु यह विधि बहुत धीमी होने की वजह से काफ़ी महँगी है। तुलनात्मक रूप से अगर देखा जाय तो प्रकाश अश्मलेखन मुद्रण जैसा है और इलेक्ट्रॉन पुंज अश्मलेखन कलम से लिखने जैसा।

वहीं दूसरी ओर संकेंद्रित आयन पुंज अश्मलेखन में इलेक्ट्रॉन पुंज के स्थान पर गैलियम आयन पुंज का प्रयोग करते हैं। गैलियम आयन इलेक्ट्रॉन की अपेक्षा काफ़ी भारी होते है। इस कारण संकेंद्रित आयन पुंज का संवेग काफ़ी अधिक होता है और इसका प्रयोग पदार्थ के चयनात्मक अपक्षरण (selective ablation) में किया जाता है। इसके लिये किसी विशिष्ट रोधक पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती, सीधे धातु या मृत्तिका (ceramic) के टुकड़े पर संरचना बनायी जा सकती है। आयन पुंज के प्रयोग से पदार्थ का निक्षेपण (deposition) भी किया जा सकता है। क्रमवार लिखने के कारण यह विधि भी धीमी और महँगी है।

Written by अंकुर वर्मा

मार्च 9, 2008 at 4:38 अपराह्न

प्रकाश अश्मलेखन

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इससे पहले कि मैं प्रकाश अश्मलेखन (Photolithography) के बारे में कुछ बताऊँ, पॉलीमर के बारे में थोड़ी जानकारी आवश्यक है। पॉलीमर एक अत्यधिक बड़े आकार का अणु होता है जिसमें कुछ सौ से लेकर कई लाख तक छोटे अणु एक श्रृंखला में जुड़े होते हैं। दैनिक उपयोग में आने वाली अनेक वस्तुयें जैसे कि प्लास्टिक, पॉलीथीन इत्यादि पॉलीमर ही होते हैं। भौतिक व रासायनिक गुणों के आधार पर इन्हें दो वर्गों में बांटा जा सकता है। पहला रैखिक श्रृंखला पॉलीमर (linear chain polymer) जिन्हें सामान्यतया आसानी से विक्षेपित किया जा सकता है और ताप बढ़ाकर पिघलाया जा सकता है। सामान्यतया ये पॉलीमर उपयुक्त विलायक में घुल जाते हैं। दूसरे प्रकार के पॉलीमर में रैखिक श्रृंखलायें भी आपस में रासायनिक बन्धों से जुड़ी होतीं हैं, अतः इन्हें पिघलाना तथा विक्षेपित करना काफ़ी कठिन होता है। साथ ही ये अधिकतर द्रवों में अविलेय होते है।

अब मुख्य बात अर्थात प्रकाश अश्मलेखन के सिद्धांत पर आते हैं। इसके लिये एक ऐसे पॉलीमर का उपयोग करते हैं जो कि पराबैंगनी प्रकाश (ultra violet light) के प्रति संवेदनशील होता है। यह संवेदनशीलता दो तरह की होती है। पहली जिसमें कि पराबैंगनी प्रकाश से पॉलीमर की श्रृंखलायें टूट जाती हैं अतः जहाँ पर प्रकाश पड़ता है उस भाग की विलेयता काफ़ी बढ़ जाती है। इस प्रकार के पॉलीमर को धनात्मक प्रकाश रोधक या पॉज़िटिव फ़ोटो रेजिस्ट कहते है। ऋणात्मक प्रकाश रोधक या नेगेटिव फ़ोटो रेजिस्ट में कुछ सक्रिय समूह होते हैं जो पराबैंगनी प्रकाश से उत्तेजित होकर आपस में रासायनिक बन्ध (chemical bond) बना लेते हैं। अतः प्रकाश पड़ने वाले स्थान की विलेयता कम (नगण्य) हो जाती है। प्रकाश अश्मलेखन के लिये पहले इनमें से किसी एक प्रकार के प्रकाश रोधक की एक पतली झिल्ली (thin film) बनाते हैं फ़िर उस पर जो आकार बनाना हो उस आकार का एक प्रकाश आच्छद (photo mask) या स्टेंसिल बनाते है तथा उसे झिल्ली पर रखकर उसपर समानान्तर पराबैंगनी प्रकाश डालते हैं, जो प्रकाश रोधक से क्रिया करके उसमें रासायनिक बदलाव लाता है।

प्रथम चरण

तत्पश्चात् प्रकाश रोधक झिल्ली को एक उपयुक्त संरचना विकसित करने वाले विलायक (developer) में डालकर धोते हैं जिसे डेवेलप करना बोलते हैं। पराबैंगनी प्रकाश से हुयी क्रिया के अनुसार झिल्ली के विभिन्न भागों की विलेयता भिन्न होती है और झिल्ली पर वांछित संरचना मिल जाती है। धनात्मक प्रकाश रोधक की झिल्ली पर प्रयुक्त आच्छद जैसी ही संरचना मिलती है इसीलिये इसे धनात्मक कहा जाता है। इसके विपरीत ऋणात्मक प्रकाश रोधक पर प्रयुक्त आच्छद के विपरीत संरचना मिलती है अतः इसे ऋणात्मक कहा जाता है।

द्वितीय चरण

आजकल लगभग सभी इलेक्ट्रानिक परिपथ इसी विधि का प्रयोग करके बनाये जाते हैं। एकीकृत परिपथ (integrated circuit) के निर्माण में प्रकाश अश्मलेखन का लगभग पचास बार प्रयोग होता है। आधुनिक प्रकाश अश्मलेखन से १०० नैनोमीटर तक की छोटी संरचना सम्भव है। १०० नैनोमीटर से छोटी संरचना के लिये अन्य विधियों जैसे इलेक्ट्रान पुन्ज अश्मलेखन या संकेन्द्रित आयन पुन्ज का प्रयोग करना पड़ता है।

नैनोविज्ञान पढ़ने वाले सभी पाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें…

Written by अंकुर वर्मा

दिसम्बर 31, 2007 at 2:02 अपराह्न

सूक्ष्म संरचना के तरीके

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इस लेख में हम जानेंगे कि सूक्ष्म (माइक्रोमीटर) तथा अतिसूक्ष्म (नैनोमीटर) स्तर पर प्रायः किन विधियों का प्रयोग करके वस्तुओं तथा यंत्रों की संरचना की जाती है।

सूक्ष्म तथा अतिसूक्ष्म सरंचना के तरीकों को मुख्यतः दो प्रवर्गों में विभाजित किया जा सकता है |

१) शीर्ष पाद विधि (Top down approach):
जब प्रारम्भ में पदार्थ का बड़ा टुकड़ा ले कर उसे क्रमशः छोटा करते जाते हैं तो उसे शीर्ष पाद विधि या टॉप डाउन एप्रोच कहते हैं| यह संरचना के परम्परागत तरीकों का ही विकसित रूप है| इसके अंतर्गत आने वाली प्रमुख विधियाँ निम्न लिखित हैं –
क. माइक्रो-मशीनिंग (micro-machining)
ख. प्रकाश अश्मलेखन (photo-lithography)
ग. इलेक्ट्रॉन पुंज अश्मलेखन (electron beam lithography)
घ. संकेंद्रित आयन पुंज (focused ion beam/ FIB)
ङ. लेसर अपक्षरण (laser ablation)

२) आधार ऊर्ध्व विधि (bottom up approach):
इस विधि में एक-एक अणु को संयोजित करके अति सूक्ष्म वस्तुओं का निर्माण किया जाता है| यह नैनो युग में विकसित नयी तकनीक है| यद्यपि अभी यह पूर्ण रूप से विकसित नहीं है और अभी भी इस पर दुनिया भर में शोध चल रही है परन्तु कम से कम सैद्धांतिक रूप से यह काफ़ी आसान, सस्ती तथा न्यूनतम अवसंरचना (infrastructure) वाली विधि है| इसके अंतर्गत आने वाली मुख्य विधि है आणविक स्वतः संयोजन या मॉलीक्यूलर सेल्फ एसेम्बली (molecular self-assembly)|

अगले लेखों में मैं इनमें से कुछ प्रमुख विधियों पर एक एक करके प्रकाश डालूँगा|

Written by अंकुर वर्मा

दिसम्बर 26, 2007 at 8:15 अपराह्न

आणविक बल सूक्ष्मदर्शी

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सूक्ष्मदर्शियों के अध्ययन के क्रम में अगली कड़ी है आणविक बल सूक्ष्मदर्शी (Atomic Force Microscope)| आयु की दृष्टि से यह नवीनतम सूक्ष्मदर्शी है जिसका आविष्कार १९८६ में हुआ| क्योंकि जाँच का यह एक अविध्वंसक (non-destructive) तरीका है अतः इसका प्रयोग बहुत से जैविक नमूनों के अध्ययन में किया जाता है| इसकी विभेदन क्षमता अन्य किसी भी सूक्ष्मदर्शी से कहीं अधिक होती है| इसके माध्यम से अणुओं को देख पाना भी सम्भव है| जैसा कि मैंने सूक्ष्मदर्शियों के बारे में अपने पहले लेख में बताया कि यह लगभग उसी तरह से काम करता है जिस प्रकार एक नेत्रहीन व्यक्ति किसी वस्तु के आकार का अनुमान लगता है|

आईये आणविक बल सूक्ष्मदर्शी के सिद्धांत को थोड़ा विस्तार से समझते हैं… आप सभी जानते होंगे कि दो अणुओं को यदि काफ़ी दूर से पास लाया जाय तो पहले उनके बीच परस्पर आकर्षण बल (वान-डर वाल्स बल) लगता है और जब वह एकदम निकट आ जाते हैं तो उनके गिर्द घूमते इलेक्ट्रॉनों की वजह से उनके बीच प्रतिकर्षण बल लगने लगता है| इस प्रक्रिया को प्रायः नीचे दिए गए स्थितिज ऊर्जा वक्र (potential energy curve) से निरूपित किया जाता है|

स्थितिज ऊर्जा वक्र

स्थितिज ऊर्जा वक्र

आणविक बल सूक्ष्मदर्शी इसी गुण का प्रयोग करके वस्तु की सतह का आरेख बनाता है| इसमें एक बाहुधारक (cantilever) होता है जिसके एक सिरे पर शंक्वाकार नोक (tip) बनी होती है| नोक और वस्तु की सतह पर स्थित अणुओं के बीच लगने वाले बल के कारण इस बाहुधारक की स्थिति में परिवर्तन होता है| इस विस्थापन को एक लेसर और फोटो-डायोड की मदद से अंकित कर लिया जाता है| आणविक बल सूक्ष्मदर्शी मुख्यतः दो विधियों से काम करता है – स्पर्श विधि (contact mode) तथा थपथपाहट विधि (tapping mode)। स्पर्श विधि में इसकी नोक वस्तु की सतह को स्पर्श करते हुए चलती है और इस प्रकार से वस्तु की सतह के सभी उतार चढ़ाव अंकित कर लिए जाते हैं| इस विधि से कठोर तथा चिकनी सतहों का चित्रण करते हैं तथा इस विधि की विभेदन क्षमता अधिक होती है| थपथपाहट विधि में बाहुधारक को उसकी नैसर्गिक आवृत्ति पर दोलन कराते हैं| नोक तथा वस्तु के अणुओं के बीच लगने वाले बल के कारण बाहुधारक की आवृत्ति बदल जाती है आवृत्ति परिवर्तन से वस्तु की सतह का अनुमान लगाया जाता है| इस विधि का प्रयोग कोमल तथा चिपचिपी सतहों के चित्रण में किया जाता है, परन्तु इस विधि से विभेदन क्षमता अपेक्षाकृत कम मिल पाती है|

आणविक बल सूक्ष्मदर्शी की क्रियाविधि

आणविक बल सूक्ष्मदर्शी की क्रियाविधि

क्योंकि इस सूक्ष्मदर्शी में इसकी नोक के द्वारा वस्तु की सतह को स्पर्श किया जाता है इसलिए इसका प्रयोग वस्तु की सतह के चित्रण के अतिरिक्त और भी बहुत सी प्रक्रियाओं में हो सकता है| उदाहरण के लिए अतिसूक्ष्म लेखन (~१० नैनो मीटर), वस्तु के सूक्ष्म भाग के यांत्रिक और वैद्युत गुणधर्म का अध्ययन इत्यादि| इन्हीं कारणोंवश इस सूक्ष्मदर्शी को नैनो युग का आधार स्तम्भ माना जाता है|

Written by अंकुर वर्मा

दिसम्बर 18, 2007 at 5:04 अपराह्न

नैनोटेक्नोलॉजी एक ऐतिहासिक दृष्टि में

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कुछ पाठकगणों के सुझाव पर आइये नैनोटेक्नोलॉजी पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से प्रकाश डालने की कोशिश करते हैं| वैसे तो प्रकृति के अनेकों प्रक्रमों में नैनोटेक्नोलॉजी सदा से ही विद्यमान रही है और सदियों से सूक्ष्मविज्ञान पर कार्य होता रहा है| परन्तु सर्वप्रथम इसे नए संभावित वैज्ञानिक आविष्कारों के स्रोत के रूप में देखा प्रोफेसर रिचर्ड फिलिप्स फेनमेन * (Richard Phillips Feynman) ने | उन्होंने २९ दिसम्बर १९५९ को कैलिफोर्निया प्रौद्योगिकी संस्थान (California Institute of Technology) अर्थात् केल्टेक (Caltech) में अमेरिकी भौतिकी समिति (अमेरिकन फिजिकल सोसाइटी) की बैठक में एक प्रसिद्ध व्याख्यान दिया जिसका शीर्षक था “आधार में काफी जगह है” (There is plenty of room at the bottom)| इस व्याख्यान में उन्होंने मुख्यतः लघुरूपण (miniaturization) तथा इससे जुड़े पहलुओं का ज़िक्र किया| उन्होंने इससे सम्भव हो पाने वाले अनेकों प्रक्रमों का उल्लेख करते हुए इस दिशा में युवा वैज्ञानिकों को पहल करने हेतु प्रोत्साहित किया| नैनोटेक्नोलॉजी नाम को सर्वप्रथम प्रयोग किया टोकियो विज्ञान विश्वविद्यालय (Tokyo Science University) के प्रोफेसर नोरियो तानिगुची (Norio Taniguchi) ने १९७४ में जब उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय उत्पादन अभियांत्रिकी सम्मेलन (International Conference of Production Engineering) में “नैनो टेक्नोलॉजी की आधारभूत संकल्पना” (On the Basic Concept of ‘Nanotechnology’) पर अपना अभिलेख प्रस्तुत किया| परन्तु १९६० व १९७० के दशक में इस दिशा में कोई खास पहल तथा अन्वेषण नहीं हुआ| इसके पीछे एक प्रमुख कारण इतने छोटे पैमाने पर वस्तुओं के परिचालन तथा लक्षण-वर्णन के लिए उपकरणों का अभाव था| परन्तु १९८० के दशक में कई ऐसे अविष्कार हुए जिनकी वजह से एक बार पुनः लोगों का ध्यान इस ओर गया और इस क्षेत्र को गंभीरता से लिया जाने लगा | इसमें १९८५ में फुलरीन (fullerene) अणु व १९९१ में कार्बन नैनोट्यूब (carbon nanotube) की खोज तथा उन्नत सूक्ष्मदार्शियों का विकास प्रमुख हैं| के. एरिक ड्रेक्स्लर (K. Eric Drexler) द्वारा १९८६ में प्रकाशित पुस्तक “सृजन के यन्त्र : भावी नैनोटेक्नोलॉजी युग” (Engines of Creation: Coming Era of Nanotechnology) के साथ आणविक नैनोटेक्नोलॉजी (Molecular Nanotechnology) के नए क्षेत्र का पदार्पण हुआ| इस पुस्तक में उन्होंने अतिसूक्ष्म संयोजकों (nano assemblers) की संकल्पना प्रस्तुत की है जोकि एक एक अणु को संयोजित करके वस्तु का निर्माण करने में सक्षम हैं और उन्होंने उससे सम्भव हो सकने वाले अनेकों नवीन आविष्कारों के बारे में बताया है| १९९० के दशक में अमेरिकी सरकार ने राष्ट्रीय नैनो टेक्नोलॉजी पहल (National Nanotechnology Initiative) नामक अभिकरण की स्थापना की जोकि इस दिशा में होने वाले प्रयासों को एकीकृत करने तथा पोषित करने का कार्य करती है| भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science and Technology/ DST) ने भी इसी दिशा में कदम उठाते हुए नैनो विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी पहल (Nanoscience and Technology Initiative) के अंतर्गत देश भर के कई संस्थानों को शोधकार्य हेतु सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं| इन्हीं में से एक केन्द्र पर, जोकि आई. आई. टी. कानपुर में स्थित है, मैं भी अपना शोध कार्य कर रहा हूँ|

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* फेनमेन अपने क्वांटम वैद्युत्गतिकी (quantum electrodynamics) पर किए शोध कार्य से अधिक प्रसिद्ध हैं इस कार्य के लिए उन्हें १९६५ के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया| उनके द्वारा लिखी गयीं पुस्तकों में से “स्योर्ली यू आर जोकिंग मिस्टर फेनमेन” (आत्मकथा), “क्यू ई डी : द स्ट्रेंज थ्योरी ऑफ़ लाईट एंड मैटर” (लोकप्रिय विज्ञान) तथा “फेनमेन्स लेक्चर्स ऑन फिजिक्स” (स्नातक भौतिकी) प्रमुख और अवश्य पढ़ने योग्य हैं|

Written by अंकुर वर्मा

नवम्बर 28, 2007 at 12:43 अपराह्न

इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की कार्यप्रणाली

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जैसाकि हमने पिछली पोस्ट में जाना कि प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी में दृश्य प्रकाश के प्रयोग के कारण उसकी विभेदन क्षमता की एक सीमा होती है जोकि लगभग २०० नैनोमीटर होती है| इससे निजात पाने के लिए लोगों ने सोचा कि क्यों न दृश्य प्रकाश के अतिरिक्त कोई ऐसी तरंग प्रयोग में लाई जाय जिसकी तरंग दैर्ध्य कम हो| कई विकल्प सामने आए जैसे कि पराबैंगनी (ultra-violet), एक्स-रे, गामा-रे इत्यादि, परन्तु इतना ही काफी नहीं था, जरूरत थी एक ऐसी तरंग की जोकि पहले तो पदार्थ से अंतःक्रिया (interaction) करके उसके प्रतिबिम्ब का निर्माण करे फ़िर उस प्रतिबिम्ब को देखा भी जा सके| ज्ञातव्य हो कि दृश्य प्रकाश के अलावा कोई भी विकिरण मानवीय नेत्रों से सीधे नहीं देखा जा सकता है| १९३१ में जर्मन वैज्ञानिक अर्न्स्ट रस्का और मैक्स नॉल ने डी-ब्रॉगली (de Broglie) सिद्धांत के आधार पर पहले इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी का निर्माण किया| डी-ब्रॉगली सिद्धांत (वस्तुत: परिकल्पना) के अनुसार सभी पदार्थों में तरंगों जैसी प्रवृत्ति होती है और उनकी तरंग दैर्ध्य उनके आवेग के व्युत्क्रमानुपाती तथा आवृति उसकी गतिज ऊर्जा के समानुपाती होती है| सरल शब्दों में इलेक्ट्रॉन तरंग की भाँति व्यवहार करता है और इसकी तरंग दैर्ध्य को इसकी गतिज ऊर्जा से नियंत्रित कर सकते हैं| उदाहरण के लिए २०० किलो वोल्ट की इलेक्ट्रॉन तरंग की तरंग दैर्ध्य मात्र २.५ पिको मीटर (०.००२५ नैनोमीटर) होती है| जहाँ तक यह प्रश्न है कि इलेक्ट्रॉन तरंगों से निर्मित प्रतिबिंब को देखते कैसे हैं, इसका भी एक आसान तरीका है| इलेक्ट्रॉन तरंगें फोटोग्राफिक प्लेट को प्रदीपित करती हैं| अपने इस आविष्कार के लिए रस्का को १९८६ में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया | अब सोच लीजिये कितना समय लगता है नोबेल पुरस्कार के लिए; वैसे उसी वर्ष उनके साथ यह पुरस्कार दो युवा वैज्ञानिकों को भी दिया गया था जिन्होंने १९८१ में पहला क्रमवीक्षण अन्वेषक सूक्ष्मदर्शी (Scanning probe microscope) बनाया था|

इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं …
१) प्रेषण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Transmission Electron Microscope / TEM)
२) क्रमवीक्षण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Scanning Electron Microscope / SEM)

इनमें से पहला सूक्ष्मदर्शी लगभग उसी सिद्धांत पर कार्य करता है जिस पर कि प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी करता है केवल इसमें कांच के लेंस के स्थान पर विद्युतस्थैतिक व विद्युतचुम्बकीय लेंस होते हैं| इसमें देखने वाली वस्तु को अत्यधिक पतला (~५० नैनोमीटर) बनाया जाता है क्योंकि इसमें इलेक्ट्रॉन तरंगें वस्तु के पार जाकर दूसरी ओर प्रतिबिम्ब निर्मित करती हैं| इसीलिए इसमें देखने के लिए नमूने की तैयारी करना काफी कठिन होता है और सभी वस्तुएं इसमें देखी भी नहीं जा सकतीं | क्योंकि अवलोकन के वस्तु को अत्यधिक ऊंचे निर्वात में रखा जाता है और उसके ऊपर अत्यधिक ऊर्जा की इलेक्ट्रॉन तरंगें गिरतीं हैं इसलिए जांच का यह एक विध्वंसक (destructive) तरीक़ा है| आधुनिक प्रेषण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता करीब ०.२ नैनोमीटर से भी कम होती है|

प्रेषण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी

प्रेषण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Transmission Electron Microscope / TEM)

दूसरे प्रकार के सूक्ष्मदर्शी की कार्यप्रणाली थोड़ी अलग होती है इसमें इलेक्ट्रॉन तरंगों को केंद्रित करके एक सूक्ष्म पुंज पदार्थ पर डाला जाता है| जब ये अधिक ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन पदार्थ पर पड़ते हैं तो उससे अपेक्षाकृत कम ऊर्जा के द्वितीयक (secondary) इलेक्ट्रॉन, पृष्ठ प्रकीर्ण (back-scattered) इलेक्ट्रॉन तथा अभिलक्षणिक (characteristic) एक्स-रे इत्यादि निकलते हैं| इन इलेक्ट्रॉन किरणों की मदद से वस्तु के आकार के बारे में सूचना मिलती है और प्रतिबिम्ब का निर्माण किया जाता है| क्योंकि एकबार में वस्तु के केवल एक ही बिन्दु की सूचना मिलती है अतः किरण पुंज को क्रमशः अलग अलग स्थान पर ले जाकर पूरी वस्तु (या उसके एक भाग) का प्रतिबिम्ब निर्मित करते हैं| इसी कारण से इसे क्रमवीक्षण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी कहा जाता है| यद्यपि इसकी विभेदन क्षमता पहले वाले से करीब १० गुना कम होती परन्तु इसमें देखने के लिए नमूना तैयार करना काफ़ी आसान होता है| यही कारण है कि आज ये इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी कहीं अधिक लोकप्रिय है| यद्यपि इसमें अपेक्षाकृत कम ऊर्जा की इलेक्ट्रॉन तरंगें प्रयुक्त होती हैं फिरभी यह एक विध्वंसक तरीक़ा ही है| आधुनिक क्रमवीक्षण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता करीब १ से २ नैनोमीटर तक होती है|

क्रमवीक्षण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी

क्रमवीक्षण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Scanning Electron Microscope / SEM)

इन दोनों ही सूक्ष्मदर्शियों में पदार्थ से निकलने वाली अभिलक्षणिक एक्स-रे के माध्यम से पदार्थ का गुणात्मक (qualitative) तथा परिमाणात्मक (quantitative) तात्त्विक विश्लेषण (elemental analysis) भी सम्भव है| इस विधि को एक्स-रे का ऊर्जा प्रकीर्णन विश्लेषण (Energy Dispersive Analysis of X-rays / EDAX) कहते हैं|

छायाचित्र सूचक:
१. इलेक्ट्रॉन बंदूक (electron gun)
२. विद्युत-चुम्बकीय लेंस (electromagnetic lens)
३. निर्वात पम्प प्रणाली (vacuum pump system)
४. नमूना मंच (sample stage)
५. नियंत्रण पट्टिका (control panel)
६. प्रदर्शन पट्टिका (display panel)
७. शीतलक (coolant)
८. कुछ और भूमिगत इलेक्ट्रानिकी (some more underground electronics)
९. प्रचालक गण (operators)

छायाचित्र स्रोत: http://www.vcbio.science.ru.nl/

Written by अंकुर वर्मा

नवम्बर 25, 2007 at 10:53 पूर्वाह्न